
Seventh house in Hindi – सप्तम ज्योतिष भाव दारा भाव, कलत्र भाव और युवती भाव से भी जाना जाता है| सप्तम ज्योतिष भाव लग्न भाव के एकदम opposite भाव है| लग्न उदय (Ascendant) है तो सप्तम अस्त (Descendant) है| तो जो भी लग्न में उदय होता है वो इस भाव में अस्त हो जाता है|
इसे मुख्य रूप से विवाह का भाव मानते हैं| लग्न भाव से एकदम प्रतिमुख है सप्तम ज्योतिष भाव (Seventh house in Hindi) – जीवनसाथी भी हम से एकदम opposite ही होता है और यही बात सप्तम ज्योतिष भाव के इस कारकत्व को सटीक करता है | लग्न के opposite होने से ये भाव मारक भाव (death inflicting) भी बन जाता है |
सप्तम ज्योतिष भाव (Seventh house in Hindi) से क्या देखते हैं?
- विवाह
- जीवनसाथी – life partner
- business partnership
- व्यापार
- समझौता
- विदेश यात्रा
- Live-in relations
- पत्नी
- प्रेमी
- sex life
- गुप्त प्रेम सम्बन्ध
- पद्प्राप्ति – ऊँची पोस्ट पाना (सप्तम भाव दशम से दशम भाव है)
- public image
विवाह एक वो क्रिया है जो हमें खुद से काफी अलग ले जाती है| ये एक social agreement है उसे अंगीकार करने का, प्यार करने और support करने का जो हम से हर तरीके से totally different हो सकता/सकती है| सप्तम ज्योतिष भाव (Seventh house in Hindi) एक महत्वपूर्ण केंद्र है जो जीवन के संतुलनकारी pendulum की तरह काम करता है| ये दूसरा कामकोण (desire/enjoyment trine) है| साधारणतय विवाह के पश्चात एक नयी जिंदगी शुरू होती है जो जिम्मेदारिओं, फर्जों और नये अनुभवों और अनुभूतिओं के पिटारे खोलती है| विवाह हर चीज़ को समतोल – balance कर देती है| मारक भाव भी होने की वजह से ये जीवन का ही संतुलन कर देती है|
वैदिक ज्योतिष के अनुसार आत्मा पंचम भाव से प्रवेश हो कर लग्न में शरीर प्राप्त कर, दशम भाव में इस जीवन के कर्मों का निवारण कर नवम भाव से बाहर निकल जाती है| इस पूरी प्रक्रिया में सप्तम भाव एक लंगर की तरह पंचम और नवम भाव के बीच संतुलन करने वाला force बन जाता है| विवाह के कारक शुक्र इस भाव के कारक हैं|
Physically पेट का निचला हिस्सा, कूल्हा, बड़ी आंत और गुर्दा इस भाव से देखे जाते हैं | Natural zodiac यानि कालपुरुष राशिचक्र में ये तुला राशि है जिसके स्वामी शुक्र हैं| कर्माधिपति (lord of all our karmas or deeds) शनि इस भाव में उच्च के होते हैं तथा कोई भी ग्रह इस राशी में नीच का नहीं होता|
क्या है कुंडली का black hole
अष्टम ज्योतिष भाव को रंध्र भाव और मृत्यु भाव सभी जाना जाता है| इसे कुडंली का black hole कहा जाता है| जो भी ग्रह यहाँ बैठे या जो भी ग्रह इस भाव से associate हो वो अपना कारकत्व और characteristic loose कर देता है| अगर इस भाव से सम्बंधित ग्रह शुभ भी हों या शुभ भावों के स्वामी हों तो वो भी अशुभ बन जाते हैं| अगर अशुभ ग्रह जो कुंडली में अशुभ भावों का स्वामित्व भी रखते हों, ऐसे ग्रह यदि अष्टम भाव से associated हो जाएँ तो यह एक प्रकार का राजयोग बनाते हैं|
अष्टम ज्योतिष भाव से क्या देखते हैं?
- आयु
- गुप्त क्रियाएं और षड्यंत्र
- रुकावटें
- विच्छेद और बदलाव
- पदच्युति
- निरादर, हार
- अचानक गिरावट
- आकस्मिक विपदा
- जीवनसाथी की संपत्ति
- अपरंपरागता
- मृत्यु की जगह एवं वजह
- प्राणदंड
- उत्तराधिकार
- पैतृक धन
- गुप्त या गड़े धन की प्राप्ति
- वसीयत
- विदेश यात्रा
- स्त्री जातक में मांगल्य
- छुपी हुई प्रतिभा hidden talents
- गुप्त सम्बन्ध
- रहस्य, गुह्यविद्या
- अध्यात्म की खोज
- असाध्य और दीर्घकालीन रोग
- वैवाहिक जीवन के समझौते
सप्तम भाव में विवाह में जब विवाह संस्थित हो जाता है तब हमें बहुत बदलाव और समझौतों से गुजरना पडता है| जन्म के परिवार से अलग हो जातें हैं, नए सम्बन्ध और नए रिश्ते बन जते हैं| धीरज और समग्रता की अधिकतम परीक्षा होती है और अगर सही तरीके से handle किया जाए तो शादी उम्र भर चलती है| अष्टम भाव इसकर भूत और भविष्य का संगम point बन जाता है और इसी कारण अष्टम भाव ज्योतिष विद्या से भी सम्बन्ध रखता है|
Physically ये भाव धड के निम्नतम भाग – जननांग, गुदा और निकसन system को दर्शाता है| Natural zodiac यानि कालपुरुष राशिचक्र में ये वृश्चिक राशि है जिसके स्वामी मंगल हैं जो जो इस भाव के आकस्मिक आपदा के कारकत्व को यहाँ फलीभूत करते हैं| हालांकि यही विश्लेषणात्मक और कुशाग्र मंगल इस भाव में गहन शोध – brilliant researches भी देता है|
ये भाव दूसरा मोक्षकोण (salvation trine) है और इसे तीसरा पणफर (cadent) हाउस भी कहते हैं| इसे त्रिशढाय भाव या दुश्स्थान भी कहा हैं याने प्रतिकूल और बुरा भाव| इस भाव में, इसी भाव के स्वामी (भावेश) को छोड़ कर कोई भी ग्रह शुभ नहीं माने गए हैं| खासकर चंद्रमा की उपस्थिति इस भाव में बहुत अशुभ मानी गई है क्यूंकि ये बालारिष्ट का कारण बन बच्चों के लिए दुष्ट फल देती है| इस तरह के अशुभ स्थिति के लिए ख़ास शांतिकर्म और उपायों की जरूरत पड़ती है| शनि जो आयु के कारक हैं, वही इस भाव के कारक हैं|
सुख का स्थायित्व कौन से भाव में है?
नवम ज्योतिष भाव को धर्म भाव और भाग्य भाव से भी जाना जाता है| जीवन में उन्नति, प्राप्ति आदि के लिए नवम भाव बहुत महत्वपूर्ण भाव है| जीवन में जो भी उपलब्धि हम हासिल करते हैं, जो कुच्छ भी हम अर्जित करते हैं उन सब का स्थायित्व (permanency) नवम भाव और इसके स्वामी के अच्छी स्थिति में होने पर निर्भर करता है| जीवन में कुछ धार्मिक या दैविक प्राप्ति करनी है तो भी नवम भाव और नवमेश का strong का होना जरूरी है| अगर ये दोनों सशक्त न हों तो life में permanency नहीं रहती, और जातक बहुत ऊपर उठेगा और उसी तरह बहुत नीचे आ जायेगा| नवम भाव और नवमेश कमजोर हों और कुंडली में strong धन भाव हों तो भी धन का स्थायित्व नहीं रहेगा, धन आयेगा और चला भी जायेगा|
नवम ज्योतिष भाव से क्या देखते हैं?
- पिता
- ऐश्वर्य
- सौभाग्य
- धर्म
- अध्यापक – गुरु – शिक्षक
- अध्यात्म
- तीर्थ यात्रा
- लम्बी यात्रा
- धर्म के प्रति झुकाव
- उपासना
- भक्ति और धार्मिक अनुष्ठान
- आगामी कर्म या अगले जन्म के कर्म
- दयालुता – उदारता
- पाण्डित्य
- नाम यश
- मंदिर या पूजा स्थान
- समुद्र यात्रा (विदेश)
- grandchildren
- उच्च शिक्षा
सप्तम भाव में विवाह के बाद, अष्टम भाव में जो transformation – बदलाव की गुणवत्ता है वो नवम भाव में आकर सही दिशा में settle हो जाती है; इस तरह से की जीवन में establish होकर अब जो धर्म का रास्ता है उसे अपनाया जाये| Physically ये पाँव के उपरी हिस्से और जांघ से सम्बन्ध रखती है| Natural zodiac यानि कालपुरुष राशिचक्र में ये धनु राशि है जिसके स्वामी ब्रह्स्पती हैं| सूर्य और ब्रहस्पति इस भाव के कारक हैं|
नवम ज्योतिष भाव धर्मकोण (religious conduct trine) का सबसे महत्वपूर्ण तीसरा कोण (trine) है| शास्त्रों के अनुसार पंचम भाव से आत्मा प्रवेश कर, लग्न में शरीर प्राप्त कर, दशम भाव में कर्म संपन्न कर नवम भाव से निष्कासित होती है| हमारे आगामी कर्म (future karmas) इसी भाव में संगृहित होते हैं| अध्यात्म प्रगति का ये आखिरी स्तर है जिसके बाद व्यक्ति स्वयं गुरु बन जाता है| अष्टम भाव की समाधि के बाद अध्यात्म का पुण्यफल नवम भाव में पूरी तरह निखर कर आता है|

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