
Gemology – रत्न विज्ञान क्या है और ज्योतिष से इसका क्या सम्बन्ध है? रत्न विज्ञान रत्नों के समस्त पहलुओं से सम्बंधित हैं जैसे कि रत्नों का खनन (mining), स्रोत, निर्माण, अंदरूनी व बाह्य सरंचना, processing (cutting & polishing) याने स्वरुप देना, वैज्ञानिक प्रणाली से पत्थरों की पहचान, grading, प्रशोधन (treatments), विपणन (marketing), इसका इतिहास एवं प्रचलित फैशन|
इसके अलावा gemstone ज्योतिष उपायों में भी बहुत मददगार साबित होता है क्यूंकि इस विज्ञान के द्वारा ही original राशी रत्न की पहचान कर असली रत्न जातक को धारण कराया जा सकता है|
रत्नों का निर्माण कैसे होता है?
पृथ्वी के गर्भ में, जहाँ प्रचंड अग्नि व ताप है वहां से खनिज पदार्थ मैग्मा या जलते हुए लावा के रूप में धरती के गर्भ से निकल कर धरती के भीतरी सतह पर आकर जमने लगते हैं| लाखों वर्षों पृथ्वी के अन्दर के gases के साथ अत्यधिक दबाव (extreme pressure) में रह कर यह मैग्मा, जिसमे पृथ्वी के गर्भ से निकले कई तरह के खनिज रहते हैं, एक घनीभूत (condensed) स्वरुप ले लेती है और विभिन्न खनिज पदार्थों के के आधार पर विभिन्न रत्नों में परिवर्तित हो जाती है| पृथ्वी को इसीलिए “रत्नगर्भा” अर्थात रत्नों को जन्म देनेवाली भी कहा जाता है|
मूंगे और मोती को छोड़ कर बाकी समस्त रत्न (gemstone) पिघलती हुई पृथ्वी के अन्दर के सबसे शुद्ध एवं सबसे उत्तम खनिज पदार्थों का घनीभूत स्वरुप है जो प्रचंड ताप व अत्यधिक दबाव से निर्मित होता है जबकि मूंगा और मोती जैविक पदार्थों से निर्मित रत्न हैं| पृथ्वी के अन्दर लाखों वर्ष रहने से रत्नों के अन्दर पृथ्वी का चुम्बकीय तत्व और अत्यधिक दबाव के कारण पृथ्वी का विद्युत् तत्व भी समावेश कर जाता है|
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प्रकृति में इस रत्नों की प्राप्ति कई प्रकार से होती है| कई बार इन्हें अत्यधिक गहरी खानों से खनन के दारा प्राप्त किया जाता है| उदाहरणार्थ हिमालय पर्वत की खदानों से नीलम, पुखराज आदि, तथा हीरा, पन्ना, गोमेद आदि gemstone समतल जमीन के अन्दर गहरी खदानों से, लहसुनिया, माणक आदि पर्वतों के नदियों से और मूंगा, मोती समुद्र से प्राप्त किये जातें हैं|
रत्नों की सरंचना क्या है?
रत्न (gemstone) निम्न खनिज पदार्थों एवं इनके मिश्रण का घनीभूत स्वरुप है:
अल्यूमिनियम, बेरिलियम, कैल्शियम, कार्बन, फ्लौरिन, हाइड्रोजन, गंधक, लोह (Iron), मैगनीज, ऑक्सीजन, फासफोरस, पोटाशियम, सोडियम, सिलिकोन, टिन, ज़िरकोनियम, जस्ता, ताम्बा इत्यादि|
नवरत्नों के निर्माण में अल्यूमिनियम, बेरिलियम, कार्बन, कैल्शियम, फ्लौरिन, हाइड्रोजन, सिलिकोन, ऑक्सीजन, एवं ज़िरकोनियम मुख्य खनिज हैं| अल्यूमिनियम, ऑक्सीजन एवं सिलिकॉन इन सब रत्नों में common है|
ब्रह्माण्ड पञ्च महाभूतों से निर्मित है| ये हैं – पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु एवं आकाश| हमारा शरीर भी शास्त्रों के अनुसार इन्ही पञ्च महाभूतों से निर्मित है| रत्नों में भी यही तत्व उपस्थित रहते हैं| प्रत्येक रत्न संवेदनशील रहता है जो अपनी रेडियोधर्मी क्रिस्टल गुण के द्वारा ब्रह्माण्ड से निकलने वाली विशेष किरणों को आकर्षित करने की विलक्षण क्षमता रखता है|
रत्न (Gemstone) किस प्रकार काम करते हैं ?
रत्न ग्रहों के उर्जा प्रसारण, आवृत्ति प्रवाह (frequency channelization) एवं प्रकाश के सिद्धांतों (light theory of the planets) यानि प्रतिबिंबन, अवशोषण और संचारण (Reflection, Absorption and Transmission )के सिद्धांतों पर काम करता है|
हर ग्रह का अपना विशिष्ट तरंगदैर्घ्य (wavelength) और अपना विशिष्ट रंग होता है| चयनशील अवशोषण (selective absorption) के माध्यम से रत्न, धवल प्रकाश (visible light) उर्जा की range से, इन विशिष्ट तरंगदैर्घ्य (wavelength) का अवशोषण कर बाकी तरंग आयामों को बिना बदले निष्कासित कर देता है| उदाहरण के लिए पन्ना देखने में हरा दिखता है क्यूंकि ये रत्न बुध के हरे तरंगदैर्घ्य (wavelength) अवशोषण व प्रतिबिंबन कर बुध की उर्जा प्रेषित करता है और बाकी समस्त तरंग आयामों का निष्कासन करता है|
रत्नों का ज्योतिष से सम्बन्ध
अति प्राचीन काल से ही मानव रत्नों से मंत्रमुग्ध रहा है| प्रारंभिक शताब्दियों में सिर्फ बड़े धनवान एवं ताकतवर लोग ही रत्न धारण करते थे और अक्सर ये आभूषणों के रूप में होते थे जिनमे कटैला, स्फटिक, garnet, जेड, मूंगा, मोती, पन्ना आदि जड़े रहते थे| आभूषणों के अलावा भी हजारों सालों से रत्नों का प्रयोग ज्योतिषाचार्यों द्वारा ज्योतिषीय उपायों और ग्रहों की शांति के लिए प्रयोग किया जाता रहा है| शास्त्रों और पुराणों में रत्नों का हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विशेष असर के उल्लेख उदाहरण सहित उल्लेख हैं|
ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में रत्नों के सम्बन्ध में विवरण है की किस तरह रत्न (gemstone) अथवा उपरत्न जीवन के अलग अलग दुखों और problems का निवारण कर सकते हैं| आगे इसमें यह भी वर्णन है की किस किस तरह नवग्रह राशी रत्नों जैसे नीलम, पुखराज, पन्ना मूंगा आदि द्वारा उन दोषों का निवारण हो जो कुंडली में अशुभ रूप से ग्रहों को पीड़ित कर जीवन में दुखों का कारण बनते हैं और किस तरह कमजोर ग्रहों को शक्ति प्रदान किया जाये जिससे जीवन के उस क्षेत्र को मजबूत किया जाये|
राशी चक्र में प्रकशित ग्रह सूर्य तथा चन्द्र को छोड़ कर हर ग्रह के स्वामित्व में दो घर या दो भाव आते हैं| इन दो ग्रहों के स्वामित्व में अशुभ स्थान या अशुभ भाव जैसे की षष्ठम या अष्टम भाव हो सकता है साथ ही शुभ भावों का जैसे पंचम या नवम का स्वामित्व भी हो सकता है| या फिर एक शुभ भाव और दूसरा अशुभ भाव भी इन ग्रहों के स्वामित्व में हो सकता है|
कौन सा रत्न (gemstone) धारण किया जाये, इससे पहले एक ज्योतिषी को बहुत ही ध्यान से कुंडली के विश्लेषण की जरूरत पड़ती है ये ध्यान में रखते हुए की जिस ग्रह का पत्थर है वो अपने स्वामित्व के दोनों भावों – शुभ भाव और अशुभ भाव – को activate कर सकता है| इसीलिए ये अवश्यम्भावी हो जाता है की ज्योतिषी पूरी permutation combination को बड़ी बारीकी से, विस्तृत रूप से विश्लेशन कर के ही रत्न निर्धारण करे, नहीं तो लेने के देने पड़ सकते हैं| रत्न (gemstone) निर्धारण या कोई भी ज्योतिषीय सलाह शास्त्रों और पुराणों में उद्धृत हैं जो वैदिक ज्योतिष की नींव है और जिस के आधार पर ही किसी भी तरह का निर्णय लिया जाना चाहिए|

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